बृहस्पति मंत्र और पूजन-विधि
बृहस्पति व्रत-कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मनोकामनाओं को पूर्ण करनेवाली है। इसे पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए। इस व्रत को सरल तरीके से किया जा सकता है। व्रत-कथा की विधि निम्नलिखित चरणों में है:
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पूजन की तैयारी
- पूजन स्थल: भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के साथ एक केले का पेड़ अनिवार्य हो।
- समय: व्रत-पूजन का आरंभ ब्रह्म-मुहूर्त (सुबह 5:00 बजे) से लेकर 10:00 बजे के बीच करना शुभ रहता है।
- व्रत की विधि: कथा के पश्चात् एक समय केवल मीठा पीला भोजन करें, जैसे: केला, बेसन का हलवा
पूजन सामग्री: पीले फूल, पीली चने की दाल, पीला फूल, गुड़, मुनक्का और केला के साथ तुलसी
पूजन की विधि
- कलश स्थापना:
- ताम्बे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल भरें।
- उसमें गुड़, चने की दाल, और मुनक्का डालें।
- कलश पर पीला चंदन और लाल कुमकुम लगाकर पूजन करें।
- भगवान का वस्त्र और अर्पण:
- भगवान को पीले वस्त्र या सूती धागा अर्पण करें।
- स्वयं भी पीले वस्त्र धारण करें।
- दीप प्रज्ज्वलन:
- केले के पेड़ के पास भगवान की मूर्ति या चित्र रखें।
- शुद्ध घी का दीपक जलाएं और प्रसाद अर्पण करें।
कथा का पालन:
- कथा सुनने या पढ़ने से पहले भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, और बृहस्पतिदेव का ध्यान और नमस्कार करें।
- कथा के दौरान:
- अपने और सुनने वालों के हाथों में पीली चने की दाल रखें।
- कथा पूरी होने तक न उठें और न बोलें।
- यदि किसी कारणवश उठना या बोलना पड़े, तो कथा पुनः शुरू करें।
- व्यवधान रहित पूजा का पालन करें।
पूजा समाप्ति:
- पूजा के बाद आरती करें।
- प्रसाद ग्रहण करें और दूसरों को भी वितरित करें।
इस विधि से बृहस्पतिवार का व्रत-कथा करने से भगवान बृहस्पतिदेव और विष्णुजी की कृपा प्राप्त होती है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
बीज मंत्र
ॐ ब्रं बृहस्पति नमः ||
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे: नमः ||
गुरु बीज मंत्र, ऐसे बीजाक्षरों से बना है जो ग्रह बृहस्पति (जुपिटर) की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। निर्धारित विधि से इन बीज मंत्रों का नियमित जाप करने से बृहस्पति ग्रह को प्रसन्न करने के सभी लाभ प्राप्त हो सकते हैं।अन्य बीज-मंत्रों के लिए यहाँ क्लिक करें – https://astrotalk.com/mantras/brihaspati-mantra
बृहस्पति व्रत-कथा का प्रारंभ
प्राचीन समय की एक कथा है कि भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य किया करता था। वह हर दिन गरीबों और ब्राह्मणों की सेवा व सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न तो गरीबों को दान देना चाहती थी और ना ही किसी भगवान का पूजन किया करती थी। इसके साथ ही वह राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।
एक दिन की बात है कि राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, और रानी महल में अकेली थी। उसी समय भगवान् बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में आये और भिक्षा माँगी तो रानी ने भिक्षा देने से इन्कार कर दिया और बृहस्पति देव से कहा कि हे साधु महाराज! मैं इस दान- पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरे पति सारा धन लुटाते रहते हैं। मेरी तो इच्छा है कि हमारा यह समस्त धन और संपत्ति नष्ट हो जाए जिससे कि मैं आराम से रह सकूँ। मुझे ऐसे धन की आवश्यकता बिलकुल नहीं है जिसको सम्हालने में ही सारा समय नष्ट हो जाये।
साधु रुपी वृहस्पति देव ने कहा- “हे देवी! तुम तो बड़ी विचित्र प्रकार की हो। धन, और सन्तान तो सभी चाहते हैं, यहाँ तक कि एक पापी भी इसकी अभिलाषा रखता है। यदि तुम्हारे पास अधिक धन हो गया है तो भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, धर्मशालाएं बनवाओ, निर्धन मनुष्य की कन्याओं का विवाह करवा दो जिससे तुम्हारे कुल का यश बढे, और स्वर्ग-प्राप्ति के साथ तुम्हारे पित्र भी प्रसन्न हों। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा।
परन्तु रानी इन उपदेशों से बिलकुल प्रभावित नहीं हुई और वह बोली- महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं।
साधु ने उत्तर दिया कि यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! ऐसा ही होगा!
तुम ऐसा करना कि प्रत्येक बृहस्पतिवार को अपना घर मिट्टी से लीपना, फिर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोना, कपडे धोबी के यहाँ धुलने डालना, राजा से कहना कि वह हजामत कराये, और भोजन में माँस-मदिरा खाना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से अंतर्धान हो गये।
साधु के कहे अनुसार रानी ने बिल्कुल वैसा ही किया। कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसका समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गया अब भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा, और सांसारिक भोगों से दुखी होकर रहने लगा ।
तब एक दिन राजा ने रानी से कहा कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं, इसलिए मैं कोई भी छोटा कार्य नहीं कर सकता। देश चोरी और परदेश भिक्षा बराबर है। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। राजा वहाँ जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन बड़ी कठिनता से व्यतीत करने लगा।
इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन जल पीकर ही रह जाती। एक दिन दासी और रानी को के सात दिन बिना भोजन के ही व्यतीत हो गए तो रात्रि ने अपनी दासी को कहा कि हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ माँगकर ले आ, ताकि थोड़े समय के लिए गुजर-बसर हो जाए। रानी की आज्ञा पाकर दासी रानी के बहन के घर चल दी।

रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी क्योंकि उस दिन गुरुवार था। पूजन के दौरान ही दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि वह वृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी। उत्तर न मिलने पर दासी बड़ी दुखी हुई और क्रोध भी आया। वह वापस राजमहल लौट आयी और रानी को सारी कथा कह सुनाई। रानी ने अपने भाग्य को कोसा।
उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैंने कोई उत्तर नहीं दिया जिससे वह दुखी हुई होगी। ऐसा सोच वह व्रत-कथा और विष्णु भगवान् का पूजन समाप्त करके अपनी बहन से मिलने राजमहल पहुंची और कहा- हे बहन, जब तुम्हारी दासी आयी थी उस समय मैं पूजन कर रही थी। वृहस्पति कथा के दौरान न उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं कुछ नहीं बोली। कहो दासी, क्यों आयी थी?
तब रानी ने कहा- बहन, तुमसे कोई भी बात छिपी नहीं है। मैंने दासी को तुम्हारे घर भोजन मांगने के लिए भेजा था, क्योंकि हम सात दिन से भूखे हैं। तब रानी की बहन बोली- देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के बारंबार आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भण्डार देखने भेजा तो उसे सचमुच एक घड़ा मिल गया जिसमे अनाज भरा हुआ था। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई।
दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! हमको जब भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी गुरुवार का व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा।
तब उसकी बहिन ने बताया की बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का, केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं, अन्न, संतान और धन देते हैं, मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई।
सात दिन के बाद जब दुबारा गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन आईं।फिर उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए, इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। वे दो थालों में सुन्दर पीला भोजन लेकर आये और एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी बड़ी-ही प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया।

इसके बाद रानी और दासी गुरुवार का व्रत रखने लगी, विष्णु भगवान का पूजन करने लगी और भगवान् वृहस्पति जी की कृपा से उनके पास पहले की तरह ही सुख-समृद्धि वापस आ गयी परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य भी करने लगी। तब दासी समझाते हुए कटी है- देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी और तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया था और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है।
रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे। दासी की बात मानकर रानी अपने धन को शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।
उधर परदेश में राजा दुःखी होकर अपने पुराने दिनों को याद कर रहा था और जंगल में एक पेड़ के नीचे आसन जमाकर बैठ गया। वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था, एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए हैं । वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे।
वे लकड़हारे रुपी राजा के सामने आकर बोले: हे लकड़हारे! इस सुनसान जंगल में किस चिन्ता में मग्न बैठा है?
लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और उत्तर दिया: महात्मा जी! आप तो सब कुछ जानते हैं, मैं क्या कहूँ। यह कहकर लकड़हाड़ा रोने लगा और साधु को अपनी आत्मकथा कह सुनाई।
महात्मा जी दयालु होते हैं। उन्होंने कहा- तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति के दिन बृहस्पति भगवान का निरादर किया था जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हुई है।अब तुम चिंता मत करो, जैसा मैं बताता हूँ वैसा ही करो। अगर तुम मेरे कहे अनुसार करोगे तो तुम्हारी सब दरिद्रता दूर हो जाएगी और पहले से भी ज्यादा धन-संपत्ति प्राप्त कर पाओगे।
तुम बृहस्पति के दिन व्रत -कथा किया करो। दो पैसे की चने की दाल और मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ और शुद्ध जल से भरे लोटे में शक्कर मिलाकर अमृत तैयार करो। फिर कथा कहो और उसके पश्चात अपने सारे परिवार और सुनने वाले प्रेमियों में अमृत व प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करो। ऐसा करने से भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी करेंगे।
साधु के ऐसे वचन सुनकर लकड़हारा बोला: हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं मिलता, जिससे भोजन के उपरान्त भी कुछ बचा सकूं। मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है। मेरे पास कुछ भी नहीं है जिससे मैं उसकी कोई खबर मंगा सकूं।
साधु ने कहा: हे लकड़हारे! तुम चिंन्ता क्यों करते हो? बृहस्पति के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियाँ लेकर शहर को जाओ। तुमको रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जायेगा। इतना कहकर साधु अन्तर्ध्यान हो गए।
धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया। लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी शहर में बेचने गया, उसे उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक पैसा मिला। राजा ने चना, गुड आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए, परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना ही भूल गया जिसके कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए।
उसी दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया था तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे, समस्त जनता मेरे यहाँ भोजन करने आवे। इस आज्ञा को जो न मानेगा उसे फाँसी की सजा दी जाएगी। इस तरह की घोषणा सम्पूर्ण नगर में करवा दी गई।
राजा के आदेश पर शहर के सभी लोग भोजन के लिए आमंत्रित थे। लकड़हारा कुछ देर से पहुँचा, इसलिए राजा उसे अपने साथ महल ले गए और भोजन कराने लगे। उसी समय, रानी की नज़र उस खूंटी पर पड़ी, जहाँ उसका हार लटका हुआ रहता था। लेकिन हार वहाँ नहीं था।
रानी को शक हुआ कि हार लकड़हारे ने चुरा लिया है। उसने तुरंत सिपाहियों को बुलवाया और आदेश दिया कि लकड़हारे को कारागार में डाल दिया जाए।
कारागार में बंद होकर लकड़हारा बेहद दुखी हो गया। वह सोचने लगा कि ऐसा कौन सा पाप मैंने पिछले जन्म में किया होगा, जिसके कारण मुझे यह अन्याय सहना पड़ रहा है। अपने हालात से टूटकर उसने उस साधु को याद किया, जिससे वह जंगल में मिला था।
उसी समय बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और लकड़हारे की दशा देखकर बोले, “अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं सुनी और न ही उनकी पूजा की, इसलिए तुझे यह कष्ट सहना पड़ा। अब चिंता मत कर। बृहस्पतिवार के दिन कारागार के द्वार पर चार पैसे पड़े मिलेंगे। उन पैसों से बृहस्पतिदेव की पूजा करना। ऐसा करने से तेरे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।”
बृहस्पतिवार के दिन लकड़हारे को सचमुच चार पैसे मिले। उसने उन पैसों से बृहस्पतिदेव की पूजा की और उनकी कथा कही। उसी रात बृहस्पतिदेव ने नगर के राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “हे राजा! जिस व्यक्ति को तुमने कारागार में बंद किया है, वह निर्दोष है। उसे तुरंत रिहा करो। रानी का हार वहीं खूंटी पर लटका हुआ है। यदि तुमने ऐसा नहीं किया, तो मैं तुम्हारे राज्य को नष्ट कर दूंगा।”
रात्रि के स्वप्न से जागने के बाद, राजा ने प्रातःकाल खूंटी पर हार देखा और तुरंत लकड़हारे को बुलाकर उससे क्षमा मांगी। राजा ने लकड़हारे को सुंदर वस्त्र और आभूषण प्रदान किए और उसे सम्मानपूर्वक विदा किया। बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर लौट चला।
जब राजा अपने नगर के निकट पहुँचा, तो उसने वहाँ का बदला हुआ रूप देखकर आश्चर्य किया। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं, धर्मशालाएं और मंदिर बने हुए थे। यह सब देखकर राजा ने लोगों से पूछा, “यह बाग और धर्मशालाएं किसकी हैं?” नगरवासियों ने उत्तर दिया, “यह सब रानी और उसकी बांदियों की संपत्ति है।” यह सुनकर राजा को गहरा आश्चर्य हुआ और साथ ही गुस्सा भी आने लगा।
जब रानी को यह खबर मिली कि राजा लौट रहे हैं, तो उन्होंने अपनी दासी से कहा, “हे दासी! देखो, राजा हमें किस हाल में छोड़ गए थे। हमारी ऐसी समृद्धि देखकर कहीं वह वापस न लौट जाएं। इसलिए तुम दरवाजे पर खड़ी हो जाओ।” रानी की आज्ञा मानकर दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई। जब राजा पहुँचे, तो दासी उन्हें आदरपूर्वक भीतर ले गई। राजा ने रानी को देखकर क्रोधपूर्वक पूछा, “यह सारा धन और संपत्ति तुम्हें कैसे प्राप्त हुई?”
रानी ने विनम्रता से उत्तर दिया, “यह सब बृहस्पतिदेव के व्रत और उनकी कृपा का परिणाम है।”
यह सुनकर राजा ने मन ही मन निश्चय किया, “सात दिनों बाद बृहस्पतिवार को तो सभी लोग बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं, लेकिन मैं प्रतिदिन तीन बार उनकी कथा सुनूँगा और रोज़ व्रत किया करूंगा।” उस दिन से राजा ने हर समय अपने दुपट्टे में चने की दाल बाँधनी शुरू कर दी और दिन में तीन बार बृहस्पतिदेव की कथा सुनाने लगे। बृहस्पतिदेव की कृपा से उनका राज्य और अधिक समृद्ध और खुशहाल हो गया।
एक दिन राजा ने सोचा कि अपनी बहन के घर जाकर मिल आना चाहिए। यह निश्चय करके राजा घोड़े पर सवार होकर बहन के घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने देखा कि कुछ लोग एक मृत व्यक्ति को लेकर जा रहे हैं। राजा ने उन्हें रोककर कहा, “भाइयों, मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो।”
उनमें से कुछ लोग बोले, “अरे! हमारा आदमी मर गया है, और तुम्हें अपनी कथा सुनाने की पड़ी है।” लेकिन कुछ अन्य लोग मान गए और बोले, “ठीक है, सुनाओ।”
राजा ने अपने दुपट्टे से दाल निकाली और कथा सुनाने लगा। जब कथा आधी ही हुई थी कि मृत व्यक्ति हिलने-डुलने लगा, और जैसे ही कथा समाप्त हुई, वह उठकर खड़ा हो गया और “राम-राम” कहने लगा। यह देखकर सभी लोग राजा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
आगे चलते हुए राजा को एक किसान अपने खेत में हल चलाते हुए मिला। राजा ने उससे कहा, “भाई! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो।” किसान ने उत्तर दिया, “जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा, तब तक चार हरैया जोत लूंगा। तू अपनी कथा किसी और को सुनाना।”
राजा बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया। लेकिन जैसे ही वह वहाँ से हटा, किसान के बैल अचानक गिरकर पछाड़ खाने लगे, और किसान के पेट में तेज दर्द उठने लगा।
उसी समय किसान की माँ खेत पर रोटियां लेकर पहुँची। जब उसने यह हालत देखी, तो उसने अपने बेटे से सब कुछ पूछा। बेटे ने पूरी बात बता दी। यह सुनकर बुढ़िया तुरंत उस घुड़सवार के पास दौड़ी और बोली, “मैं तेरी कथा सुनूंगी, लेकिन तू मेरे खेत पर चलकर ही अपनी कथा सुनाना।”
राजा बुढ़िया के साथ उसके खेत पर गया और वहाँ कथा सुनाई। जैसे ही कथा समाप्त हुई, बैल उठकर खड़े हो गए, और किसान के पेट का दर्द भी तुरंत ठीक हो गया। यह देखकर किसान और उसकी माँ ने राजा को धन्यवाद दिया और बृहस्पतिदेव की महिमा का गुणगान किया।
राजा अपनी बहन के घर पहुँचा, जहाँ बहन ने बड़े प्रेम से उसकी आवभगत की। अगले दिन सुबह, जब राजा उठा, तो उसने देखा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं। राजा ने अपनी बहन से कहा, “क्या यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने अभी भोजन न किया हो? मैं उसे अपनी बृहस्पतिवार की कथा सुनाना चाहता हूँ।” बहन बोली, “भैया, यहाँ ऐसा रिवाज है कि लोग पहले भोजन करते हैं और फिर अन्य काम करते हैं। लेकिन मैं पास-पड़ोस में देखती हूँ कि कहीं कोई ऐसा व्यक्ति हो।” यह कहकर वह देखने निकल पड़ी, पर उसे कोई ऐसा नहीं मिला जिसने भोजन न किया हो। तभी उसे पता चला कि एक कुम्हार का लड़का बीमार है और उनके घर में तीन दिनों से किसी ने भोजन नहीं किया है। बहन ने कुम्हार से अपने भाई की कथा सुनने का आग्रह किया, और वह मान गया।
राजा ने कुम्हार के घर जाकर बृहस्पतिवार की कथा सुनाई। कथा समाप्त होते ही कुम्हार का बीमार लड़का ठीक हो गया। यह चमत्कार देखकर सभी लोग राजा की प्रशंसा करने लगे और बृहस्पतिदेव की महिमा का गुणगान किया।
कुछ दिनों बाद राजा ने अपनी बहन से कहा, “हे बहन! अब मैं अपने घर लौटना चाहता हूँ। तुम भी साथ चलो।”
बहन ने यह बात अपनी सास को बताई। सास ने कहा, “हाँ, तुम अपने भाई के साथ जा सकती हो, लेकिन अपने बच्चों को मत ले जाना। तुम्हारे भाई की कोई संतान नहीं है, इसलिए उन्हें देखकर उनके मन में दुख हो सकता है।” यह सुनकर बहन चिंतित हो गई, पर उसने अपनी सास की बात मान ली और तैयार होने लगी। बहन ने अपने भाई से कहा, “हे भैया! मैं तो चलूंगी, लेकिन मेरे बच्चे साथ नहीं जाएंगे।”
राजा ने उत्तर दिया, “जब तुम्हारे बच्चे नहीं चलेंगे, तो तुम्हारे आने का भी क्या अर्थ है।”
यह सुनकर राजा बड़े दुःखी मन से अपने नगर लौट आया। वहाँ पहुँचकर उसने रानी से कहा, “हम निरवंशी हैं। हमारा जीवन व्यर्थ है। मुझे कुछ भी खाने-पीने का मन नहीं करता।” रानी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “हे स्वामी! बृहस्पतिदेव की कृपा से हमें सब कुछ मिला है। वे हमें औलाद भी अवश्य देंगे।” उसी रात राजा को स्वप्न में बृहस्पतिदेव ने दर्शन दिए और कहा, “हे राजा! उठो और चिंता छोड़ दो। तुम्हारी रानी गर्भवती है।” सुबह जब राजा जागा और यह बात रानी से कही, तो दोनों को बड़ी प्रसन्नता हुई।
नौवें महीने में रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।राजा ने प्रसन्न होकर रानी से कहा, “हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, लेकिन बिना बोले नहीं। जब मेरी बहन हमारे घर आए, तो उससे कुछ कहना मत।” रानी ने मुस्कुराते हुए हामी भर ली।जब राजा की बहन को इस शुभ समाचार का पता चला, तो वह बहुत खुश हुई और अपने भाई के घर बधाई देने आई। लेकिन जैसे ही वह पहुँची, रानी ने हँसते हुए कहा, “घोड़े पर सवार होकर नहीं आई, गधे पर चढ़कर आई हो।”
यह सुनकर राजा की बहन मुस्कुराई और बोली, “भाभी, यदि मैं ऐसा न कहती, तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती!”
बृहस्पतिदेव ऐसे ही कृपालु हैं। जैसे-जैसे भक्तों के मन में कामनाएँ होती हैं, वे उन्हें पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और सद्भावना के साथ बृहस्पतिवार का व्रत करता है, कथा पढ़ता है, सुनता है या दूसरों को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं।
॥ बृहस्पतिदेव की कथा ॥

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण रहता था, जो अत्यंत निर्धन था। उसके कोई संतान नहीं थी, और उसकी पत्नी भी बहुत मलीनता से जीवन जीती थी। वह न तो स्नान करती, न किसी देवता की पूजा-पाठ करती। ब्राह्मण इस स्थिति से बहुत दुःखी था। वह अपनी पत्नी को बहुत समझाता, लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं होता था।
भगवान की कृपा से एक दिन ब्राह्मण के घर कन्या रूपी रत्न का जन्म हुआ। कन्या जब बड़ी हुई, तो उसने प्रातःकाल स्नान करना, विष्णु भगवान का जाप करना, और बृहस्पतिवार का व्रत रखना शुरू कर दिया। पूजा-पाठ समाप्त करने के बाद वह विद्यालय जाती और अपने साथ मुट्ठी भर जौ लेकर रास्ते में बिखेरती जाती। भगवान की कृपा से वे जौ स्वर्ण में बदल जाते थे। लौटते समय वह उन सोने के जौ को चुनकर घर ले आती थी।
एक दिन वह बालिका सोने के जौ को सूप में फटककर साफ कर रही थी। यह देखकर उसके पिता ने कहा, “हे बेटी! सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए।”
दूसरे दिन बृहस्पतिवार था। कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना की, “हे देव! यदि मेरी पूजा सच्चे मन से हुई है, तो मेरे लिए सोने का सूप दे दीजिए।” बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना सुन ली। जब वह जौ बिखेरकर लौट रही थी, तो उसे बृहस्पतिदेव की कृपा से सोने का सूप मिला। वह उसे घर ले आई और उसमें जौ साफ करने लगी।
लेकिन उसकी माँ का व्यवहार अब भी पहले जैसा ही था। एक दिन जब कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी, उसी समय उस नगर का राजकुमार उधर से गुजरा। कन्या के रूप और कार्य को देखकर वह मोहित हो गया। घर लौटकर उसने भोजन और पानी का त्याग कर दिया और उदास होकर लेट गया।
राजा को जब यह बात पता चली, तो उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के साथ राजकुमार के पास जाकर पूछा, “हे पुत्र! तुम्हें किस बात का कष्ट है? यदि कोई समस्या है, तो बताओ, मैं उसे दूर करूंगा।” राजकुमार ने उत्तर दिया, “पिताजी, मुझे किसी बात का कष्ट नहीं है। लेकिन मैं उस कन्या से विवाह करना चाहता हूँ, जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी।” राजा यह सुनकर आश्चर्य में पड़ गए और बोले, “हे पुत्र! ऐसी कन्या का पता तुम्हीं लगाओ। मैं तुम्हारा विवाह उससे अवश्य कराऊंगा।”
राजकुमार ने उस कन्या के घर का पता बताया। राजा ने अपने मंत्री को कन्या के घर भेजा। मंत्री ने ब्राह्मण को पूरा हाल सुनाया। ब्राह्मण राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गया। विधि-विधान के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ।
विवाह के बाद, ब्राह्मण का घर फिर से पहले की तरह निर्धन हो गया। भोजन के लिए भी अन्न मिलना मुश्किल हो गया। एक दिन ब्राह्मण अपनी पुत्री के पास पहुँचा। पुत्री ने पिता की दुःखभरी हालत देखी और पूछा, “मां कैसी हैं?” ब्राह्मण ने सारी स्थिति बताई। पुत्री ने अपने पिता को बहुत सारा धन देकर विदा किया।
कुछ समय बाद फिर वही स्थिति हो गई। ब्राह्मण फिर अपनी पुत्री के पास पहुँचा और अपनी परेशानी बताई। इस बार पुत्री ने कहा, “पिताजी, माताजी को यहाँ ले आइए। मैं उन्हें वह विधि बताऊंगी, जिससे उनकी गरीबी दूर हो जाएगी।” ब्राह्मण अपनी पत्नी को लेकर पुत्री के घर पहुँचा। पुत्री ने अपनी माँ से कहा, “हे माँ! सुबह स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करो। इससे तुम्हारी दरिद्रता दूर हो जाएगी।” लेकिन माँ ने उसकी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री के बच्चों की जूठन खा ली।
यह देखकर पुत्री को बहुत गुस्सा आया। उसने एक रात अपनी माँ को कोठरी में बंद कर दिया और कोठरी का सारा सामान बाहर निकाल दिया। अगले दिन प्रातःकाल उसने अपनी माँ को बाहर निकाला, स्नान करवाया, और पाठ करने को कहा। धीरे-धीरे उसकी माँ की बुद्धि ठीक हो गई।
अब उसकी माँ ने हर बृहस्पतिवार को व्रत करना और पूजा करना शुरू कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण और उसकी पत्नी धनवान और पुत्रवान हो गए। बृहस्पतिदेव की कृपा से उन्होंने इस लोक में सुख पाया और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए।
सब बोलो विष्णु भगवान की जय! बोलो बृहस्पतिदेव की जय!
देवी सरस्वती के बारे में पढ़ें https://journals-times.com/2024/02/12/goddess-saraswati-secrets-hidden-in-sanskrit-scriptures/
अथ श्री बृहस्पति भगवान् की आरती
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।
छिन-छिन भोग लगाऊं फल मेवा॥ ॐ॥
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतयामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ॥
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी ।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ॥
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हरता ।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भरता ॥ ॐ॥
तन मन धन अर्पणकर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥ ॐ॥
दीन दयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप दोष सब हरती, भव बंधन हारी॥ ॐ॥
सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारे।
विषय विकार मिटाओ, सन्तन सुखकारी॥ ॐ॥
जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे।
रिद्धि-सिद्धी, सुख-सम्पति, निश्चय फल पावे॥ ॐ॥
सब बोलो विष्णु भगवान की जय।
सब बोलो बृहस्पति भगवान की जय।
आरती श्री सत्यनारायण जी की (लक्ष्मी-विष्णु आरती)
जय लक्ष्मी रमणा स्वामी, जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥ जय॥
रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निरंजन, घंटा ध्वनि बाजे॥ जय॥
प्रभु भए कलिकारण, द्विज को दरस दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥ जय॥
दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपत हरी॥ जय॥
वैश्य मनोरथ पाया, श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी॥ जय॥
भाव- भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो।
श्रद्धा धारन कीनी, तिनके काज सरयो॥ जय॥
ग्वाल – बाल संग राजा, बन में भक्त करी।
मनवांछित फल दीनों, दीनदयाल हरी॥ जय॥
चढ़त प्रसाद सवायो , कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥ जय॥
श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई जन गावे।
रिद्धी-सिद्धि सुख सम्पत्ति, मनोवांछित फल पावे॥ जय॥

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